राजपूत का जीवन

राजपूत का जीवन || राजपूत जीवन संध्या

राजपूत का जीवन

भारत के राष्ट्रीय जीवन मे राजपूत शब्द एक परंपरा के रूप में परिणित हो गया है .. जहां इस जाति ने बसकर एक बंजर ओर मरु भूमि में , अपनी चेतना और चरित्र से ही अपना राग, ओर रक्त से अपना इतिहास रचा, उस स्थान को राजस्थान कहते है !!
मध्ययुग में जहां जौहर की चिंताएं जली, ओर जिन वीरांगना क्षत्राणियो ने , अग्नि की भयावह लपटों का प्रेम से आलिंगन किया, वहीं पुरुष प्रवीरो ने केशरिया बाना पहनकर शत्रु को यही सिखाया की सिंहःव्रत क्या होता है ………..
राजपूतो के बारे में आज अनेक तरह की अटकलें लगाई जाती है, आरोप लगाए जाते है, उनके इतिहास को चोरी किया जाता है, ओर राजपूतो के बारे में अनर्गल प्रलाप किया जाता है, उसने इतिहास का मख़ौल बनाकर छोड़ दिया है । इस देश के लोगो को … इस देश के इतिहासकारो को …. अपनी अटकलों के बीच इतिहास के चिंतकों ओर दो कौड़ी के दार्शनिको ने तत्कालीन सामाजिक चेतना और राष्ट्रक्रांति के उद्घोष को नही सुना !
अंग्रेजी के ग्रन्थो को पढ़कर , इतिहासकार बनने वालो के कानों में राजपूतो के राष्ट्रप्रेम की ” राष्ट्रवाणी कभी पहुंच ही नही सकी । यौद्धेय स्वतंत्रता , सौहार्द ओर समता के आदर्शों पर चलकर, भूमि से लेकर पशुओं तक कि पूजा करने वाले राजपूतो को विदेशी कहने में इतिहासकारो को ज़रा भी लज्जा नही आयी ।
राजपूतो पर आरोप- प्रत्यारोप लगाने वाले अति-ज्ञानीजन एक बार रोम-मकदूनिया आदि देशों का इतिहास भी पढ़े, गरीब लोगों को आजीवन दास बनाकर रखा जाता था लोगो की, ओर आप ओर हम भारत मे दूध की नदियां बहा रहे थे । मनुष्य को पीड़ा देने की बात तो दूर है … राजपूतो में तो ऐसे राजा हुए है, जो भूलवश हुए जानवरो के वध के शोक में भी संन्यास ले लेते थे …. राजा भृतहरि उदारहण है । ऐसे दयालु राजपूत कभी स्वार्थी शाशक हो सकते थे ??
जब से इस आर्यवत का इतिहास लिखा गया है , तब से लेकर आज तक अगर देश के लिए सबसे ज़्यादा खुन किसी ने बहाया है, तो वह राजपूत ही है । भगवान श्री राम से लेकर अंतिम वीर दुर्गादास राठौड़ …… यह सभी राजपूत ही थे । देवासुर – संग्राम में जिसने दैत्यों के वध करने वाले वीर ” राजपूत ” ही थे।
मनुस्मृति में रामायण में , एवम गीता में इन्ही रक्षको को क्षत्रिय कहा जाता है। ओर क्षत्रिय राजकुमार को — महात्माराजपुत्रोयं कहा गया है । युद्ध करना ही उनका स्वधर्म ओर स्वकर्म था । किसी भी कारण से काम, लोभ, क्रोध या द्रोह से — उसे स्वधर्म का त्याग करना उचित न था । राजपूतो को बचपन से एक ही शिक्षा दी जाती थी —-
” नैव नित्यं जयस्तात , नैव नित्यं पराजय: “
ना तो सदा किसी की जय होती है, ओर ना पराजय ….
कुछ राजपुत्रः उर्फ राजपूत भी अगर मन मे सवाल बैठा चुके है, की राजपूत शब्द नवीन है, तो यह भरम निकाल दीजिये । जैसा कि कुछ लोग राजपूत नाम मुगलो-अंग्रेजो का दिया बताते है ।
800 ई- से लेकर 1000 ई के बीच जितने भी ग्रन्थ लिखे गए, उनमें लगभग सबमे ” राजपुत्रः ” शब्द आया है । कथासरित सागर जो कि 1000 ई में लिखी गयी है, उसमे भी राजपुत्रः शब्द का ही उल्लेख क्षत्रियो के लिए किया गया है ।
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#युद्ध_भूमि से ना भागने वाले राजपूत सुर को ही क्षत्रिय कहा गया है । ओर जो युद्ध भूमि से भाग जाता है, वह क्षत्रिय नही है ।
“भग्नो न भूमि रजपूत हो , करो नाम निजी अचल ध्रुव
ते न गनिए सुर धर्मुतीन क्षत्रिय नाही ।
राजपूत का जीवन
राजपूत का जीवन
शुद्ध क्षत्रिय वही था, जो खड्ग द्वारा युद्धभूमि में कट जाने से मुक्ति पाता था । ( रजपूत मुक्ति खिति खग्गगिरी ) पृथ्वीराज रासो
कर्नल टॉड ने सही ही कहा है, एक राजपूत कभी किसी के जैसा बनने की कोशिश नही करता था, वह शिवाय त्रिदेवों के किसी को अपना आदर्श ना मानते थे, अपनी वीरता , बलिदान और शौर्य से अपना इतिहास लिखने की होड़ मची होती थी ।
कर्नल टॉड ने राजस्थान में राजपुतो के इतिहास को लिखने के बाद एक ही बात कहीं थी ” राजस्थान का कोई ऐसा गांव नही जहां शूरवीर ना पैदा हुए हो !!
सिंह’ शब्द क्षत्रियों के नाम के अंत में लगाने की प्रथा है । परन्तु ‘सिंह’ ही शब्द क्यों लगया ?
क्या दूसरा शब्द नहीं था ? इस विषय में कोई इतिहास मिलता है या नहीं यह जानना आवश्यक है ।
‘सिंह’ संस्कृत शब्द है इसका अर्थ ‘ बनराज ‘ पशुओं का राजा होता है । ‘राजा’ यानी राज्य करने वाला । जिसकी आज्ञा का सभी लोग पालन करते हों । और वह सबसे श्रेस्ठ हो ।
जिस प्रकार सिंह को बलवान से बलवान पशुओं में धाक बैठाने के कारण सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ,उसी प्रकार क्षत्रियों को भी चार वर्णों में कर्म के हिस्से में राज्यों का संरक्षण और प्रजा का पालन करने का कर्तव्य सौपा था । इसीलिए श्रेष्ठता सूचक ‘सिंह ‘ अपने नामों में लगाते है। महाभारत अथवा पुराणकालीन युग में ऐसा कोई नाम नहीं मिलता जिसके अंत में ‘सिंह’ शब्द लगाया गया हो । क्षत्रियों के उस समय के नामों को देखो – महाराजा रघु ,जिनके रघुकुल में से श्री रामचन्द्रजी ने जन्म लिया श्री कृष्ण ,युधिस्ठिर ,अर्जुन,भीमसेन, ययाति, धृतराष्ट्र ,दुर्योधन, हरिश्चंद्र ,विक्रम ,भोज इत्यादि हुए।
इतिहास प्रथम सिहांत , सबसे पहले सिंह शब्द नाम ,’शाक्यसिंह ‘ बतलाता है । यह महाराजा शाक्य के नाम से ही गौतम बुद्ध का नाम पड़ा था यह बाद में भगवान बुद्ध कहलाये । इसी वजह से शाक्यों में श्रेष्ठ गौतमबुद्ध थे , इसके लिए अमर कोष के श्लोक –2
इससे सिद्ध होता है कि अपनी श्रेष्ठता और शक्ति के कारण ‘सिंह’ शब्द अंत में लगाया गया है ,ऐसा मानने में आता है ।
दूसरी सदी कि शुरुआत में गुजरात, काठियावाड़, राजपूताना, मालवा, दक्षिण, आदि देशों पर राज्य करने वाले मध्य एशिया (ईरान) की शाक्य जाति का क्षत्रवंशी राजा रूद्रदामना दूसरा कुमार महाराजा रुद्रसिंह के नाम के अंत में ‘सिंह’ शब्द पाया गया है । (वि० सं० २३८ ई० सं० १८१ सं० ४४५ में होने वाले ‘रूद्र सिंह’ और ‘सत्य सिंह’ के नाम प्राचीन लेख और ताम्रपत्र तथा सिक्का, मिल चुके हैं । इसके पीछे ‘सिंह’ नामांत का क्रम राजवंशों में प्रचलित हो गया ।
सोलंकी क्षत्रियों में ‘जयसिंह’ नाम का एक राजा वि०सं० ५३४ में हो गया है । महामहोपाध्याय रायबहादुर गौरीशंकर ओझा कृत ‘सोलंकियों के प्राचीन इतिहास’ में से इस सम्बन्धी प्रमाण मिलते हैं ।
विक्रम की १०वीं सदी में मालवा के ‘परमार’ वरसिंह पहला और १२वीं सदी में गहलोत वंशीय महाराणा उदयपुर मेवाड़ के पूर्वज ‘वैरा सिंह’, ‘विजय सिंह ‘ । वि० सं० १२७३ में ‘अरि सिंह’ आदि नाम मिलते हैं ।
कच्छवाहों में नरवर ‘ग्वालियर वाला राजा ‘गगनसिंह ‘, ‘शरद सिंह’ और ‘बीर सिंह’ नामों में शब्दांत ‘सिंह’ शब्द है ।
कच्छवाहों के वि० सं० ११७७ के कार्तिक बदी ३० रविवार का शिलालेख देखा हुआ है । ( जनरल ऑफ़ अमेरिकन ओरिएण्टल सोसाइटी भाग ६ पृ १४२ ) मुग़लकाल में ‘सिंह ‘शब्द का प्रचार बढ़ गया था ।
राजपूतों के अलावा दूसरी जाति भी इस शब्द का प्रयोग करने लग गई है । ‘सिंह ‘ शब्द उस समय से उपाधि नहीं बल्कि बहादुरी के अर्थ में प्रचलित हो गया है । ‘सिंह ‘ जैसे बहादुर कि तरह जब हिन्दू ‘सिंह ‘ शब्द नाम के पीछे लगाने लगे !!
राजपूतो के नाम के आगे सिंह , उनकी बहादुरी के कारण लगता था, न कि किसी की देंन् के कारण, या ना किसी विदेशी की उपाधि के कारण !! –

राजपूत का जीवन || राजपूत जीवन संध्या

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